Nazm ek biryani hai

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नज़्म एक बिरयानी है 

तलब का  ग़ुबार सा उठता है

ज़ेहन के होटो पर,

उँगलियों के दरीचों से

काग़ज़ की थाली में

ख़यालो की सुनेहरी कड़ाई में,

वक़्त की आंच पर,

जब मोती समान अल्फ़ाज़ पकते है

तो एक नायब तश्तरी का मुज़ाहेरा होता है

जिसके दस्तरख़ान पर सुखन-साज़ बड़ी अदब से

एक-एक अल्फाज़ नोश फ़रमाते है

वही निवाले

जिसमे हालात का तेल गिरता है

मोहब्बत का गरम मसाला पड़ता है

वफ़ाई और बेवफ़ाई का गोश पकता है

वही निवाले

जो ज़ुबां छूते ही, वाह-वाह के कालीन बिछाते है

क्या बात है, के ज़ायके को उँगलियों से चाटते है

वही निवाले

जो दात्तो की चकियों में पीसकर

गले की गलियों से गुज़रकर

दिल का पता पूछते है

वही निवाले

जिस की ख़ुशबू, ज़ेहन के बाशिंदों को तरो-ताज़ा रखती है

जो एक के बाद एक ख़्वाहिशों की मिलकियत करती हैं

लाख कितने भी निवाले पेट में डालो, लेकिन सुकून नहीं बकश्ति

नज़्म एक बिरयानी है, बड़े नसीबवालों को मिलती है

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Mardangi ab khatm hone ko hai

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मर्दानगी अब ख़त्म होने को है 

दीवार के उस पर से हर रोज़ मुझे एक चीख़ सुनाई देती है

वज़नी साँसे, मुफ़लिसी की बेड़ियाँ पहने, मुझसे रेहमत अनगिनत फ़रियाद करती हैं

और मैं, बुज़दिली का हिजाब पहने उसे अनदेखा कर देता हु

घर में औरतें अब श्रृंगार नहीं करती

हातों पर, हीना के बजाए मर्दों के गेज़ की गाड़ी लाल लकीरों ने जगेह लेली हैं

अब गालों के छोटे-छोटे कमरों से, वो गुलाबी बाशिंदे कब का ख़ुदा हाफ़िज़ केह चुके है

उनके बदले, उदासी का बस्ता लाधे कुछ काले – डरावने ख़ानाबनदोष वहां घुमा करते हैं

जब, ख़ून शरीर का दामन छोड़कर लिबास से जा लगता है

तो ये मर्द उसे बड़ी ओछी निगाहों से देखता है

मज़ाक के कटोरे में डालकर

बेअदबी के ज़ायका को चाट करता है

रास्तों पर, जो मज़लूमियत के मकान में रहते है

उनसे वो कहा सलाम-दुआ रखता है

मार खाती है, जब सरे-आम कोई औरत

मर्दानगी को ख़मोशी के किनारे लगाकर, सिर्फ़ तमाशा देखता है

जिस्म का जो वो एक हिस्सा है

क्या वही तेरी मर्दानगी का किस्सा है ?

अपनी ज़िन्दगी के आसमान पर, मर्दानगी के मांझे से कई बार

तूने मेरी ख़्वाहिशों के पेंच काटे हैं

ख़ुशियों की ओक में, जभी में ज़िन्दगी को भरती हु

तब-तब तू तूफ़ान बनकर मुझ पर बरसा है

वक़्त के नोक-ए-खार पर तू दस्त-बरदार होने को है

लगता है,

मर्दानगी अब ख़त्म होने को है

 

Ghum-e-Husain

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ग़म -ए -हुसैन  

ग़म सिर्फ़ एक का नहीं  ७२ का हैं

ये किस्सा किसी और का नहीं, ये वाक़िया रसूल के घर का है

ज़ुलम का पारा इतना ऊँचा है,  अर्श भी लरज़ उठ ता है

क्या पत्थर, क्या इंसान हर कोई कोई मातम की सफ में दिखता है

यह किसी और के ज़ख़्म का  नहीं

अली के दुलारे

ज़हरा के लाल

नबी  नवासे

यह किसी और के ज़ख़्म का  नहीं

मज़लूमे करबला का

इन्सानियत के सिप्पेह सालार का

अमन के इमाम का है

ये ज़ख़्म किसी और का नहीं, ये ज़ख़्म हुसैन इमाम है

दर्द भी जगह ढूंढता है के वो उठे तो कहा से उठे

सबर भी सबर ढूंढता है के वो बंधे  तो कहा से बंधे

किसी के गालों पर तमाचों के निशान है

किसी के ज़ेवर खींचकर, उन कानों में ज़ख़्मी आवाज़ है

किसी मासूम के दिल पर बरछी को गाड़ रखा है

रेत के हर क़तरे में सिर्फ़ ख़ून ही ख़ून बिखरा है

दिररे जो उन बेकसों को मारे है, अब उन पर चमड़ी की परत जम चुकी है

बुज़ुर्ग हो या ६ महीने के अलिअसग़र सब की सदा छिन चुकी है

सुरज के लिबास में भी अब नमी सी आगयी है

वो कहता है, उन ज़ख्मो का किस ज़ुबान से बयान करू

कट्टे वफ़ा के हाथ, वो नेहर पर जा गिरा है

तो कही एक बाप अपने १८ बरस के नौजवान को अपने कांधे पर उठा रहा है

खुद दरया भी प्यास से तड़प रहा है

१४०० बरस बीत गया,वो आज भी  हुसैन के क़सीदे पढ़ रहा है

नमाज़ भी खुद सजदे में है, कोई उससे हुसैन सा आकर अदा करे

रोते है ख़ुदा भी, तो चलो ए दोस्तों हम भी इन ज़ख्मो की अज़ा करे

Notebandi

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नोटबंदी 

एक रोज़ सुनी एक ख़बर, जिससे सारा मुल्क देहल गया

Black money का एनकाउंटर किया, और उसके जश्न में पूरा इंडिया लाइन में लग गया

धंधा पानी थप हुआ

सियासत ने मज़लूम को फ़िर से थप्पड़ जड़ा

social media के   परदों पर कई लोगों उसकी सराहना की

तो कुछ उस पर थूक कर, मुख़ालेफ़त चबाने लगे

ख़बर आती रही, कितने काला बाज़ारियों का हुआ हाल बेहाल

एक सप्ताह बीत गया, इंडिया लाइन में खड़ा है फ़िलहाल

पूछा इसका कारन, तो वाज़िर -ए -खज़ाना बोल उठे

भाई ३ हफ्ते लगेंगे ATM को re-calibrate करने में

सहाफी ने सवाल किया तो इसकी तैयारी आपने पहले क्यों नहीं की ?

तो बोले, फ़िर सीक्रेसी कैसे रहती

हा जनाब सीक्रेसी  कैसे रहती, लोगों में अफ़रा – तफ़री मचने की

सीक्रेसी  कैसे रहती, रोज़ी-रोटी छोड़कर बैंक की कतार में लगने की

सीक्रेसी  कैसे रहती, हमारा chu *** काटने की

मेरे पास कोई काला धन नहीं है

बल्कि मैंने तो नोटों का बंडल सिर्फ फिल्मों में देखा है

ना में धर्म की आड़ में अल्फ़ाज़ों की गोली दाग रहा हु

ना में किसी पोलिटिकल पार्टी का मेहबूब हु

फ़िर इतनी तकलीफ़ मुझे क्यों

मेरे घर में एक शक्स है

हम दोनो का रिश्ता बाप – बेटे का है

अब्बा की एक छोटी दूकान है

जिसके गल्ले में आज कल सिर्फ़ तंगी बसेरा करती है

वो अब नहीं कहते, के दिन कैसे बिता

क्यों की उनके माथे पर फ़िक्र में डूबी पेशानी, सब  कुछ कह देती है

आस पास के सारे बाज़ार सुने पढ़ गए है

मानो नोटबंदी ने सबकी रोज़ी को लकवा मार दिया हो

अब आप ठहरे बड़े लोग,  अकल्मंद लोग कहते होंगे

थोड़ी प्रोब्लेम्स तो सबको उठानी पड़ेगी

क्या है आपने कभी सिक्के का दूसरा पहलु देखने की ज़हमत नहीं की है

क्या है आपके कंधो पर क़र्ज़ का बोझ नहीं है

क्या है अपने कभी मज़बूरी का फ़ाक़ा नहीं किया

क्या है आप की एक छोटी दुकान नहीं है

क्या है आपका घर उस दुकान के भरोसे नहीं चलता

ख़ैर छोड़िये

मैं यहाँ आपके इरादों पर ताने कसने नहीं आया हु

बस नोटबंदी का थप्पड़ जो पड़ा है मेरे गाल पर

उसके निशान दिखलाने आया हु

Badal

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बादल 

मैं कोई ज़मीन की नज़रो से दूर,

सूरज को पहर देने वाला,

पहाड़ों को सीचने वाला,

बारिश में बरसने वाला,

अपनी ताख़ में तारों को समेटने वाला,

वह कुदरत का नायब अजूबा नहीं हु।

मैं तो ख़यालों को पिरोने वाला,

ख़ुशी और ग़म के कसीदें पढ़ने वाला,

वक़्त की आहट पर करवट लेने वाला,

शब्दों के सहारे खुदा को ढूंढने वाला,

एक नज़मो का बादल हु।

जिसे ज़मीन और आसमान दोनों ने बाटा हैं

जिस के शब्दों पर सूरज का बोसा है

जिस के ईमान में चट्टान की कशिश है

जो बिना निदा दिए मोहब्बत से बरस पड़ता है

अपनी ताख़ में कविताओं को, ग़ज़लों को, अशआर को समेटने वाला,

कलम का बादल हु।

Baarish

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बारिश 

थकावट और गर्मी का हिजाब पहने 

इन निगाहों को कई वलवले थे,

के बारिश अपना बोसा कब देगी 

किस्मत, खेत और यह ज़मीन 

सब इज़्तिराब में थे,

के बारिश की तलककि कब होगी   

ज़िन्दगानी उस मारेफ़त के लिए बेचैन थी 

उस मिस्क की खुशबू से मुलाकात कब होगी 

कागज़ के पन्ने वक़्त की आगोश में करवट बदल रहे थे 

के वह कश्ती का रूप कब लेंगे 

आख़िर में,

कुछ बूंदे गिरी 

आसमान के लहज़े में बारक का लिबास दिखने लगा 

दिन और रात का फ़रक़ मिटने लगा  

जब वह हुई जलवा अफ़रोज़,

तो सभी ने उसका इस्तेकबाल किया 

बाह फैलाए, सड़क पर खड़े होकर, मैंने भी उसका ख़ैर मकदम किया    

लेकिन उसकी तासीर में आज वह बात नहीं थी

एक नमी सी पैदा कर के

वह मकानों के शीशों पर

पेड़ों पर

मेरे मेहबूब की गेसू-ए-ताब्दार पर

वह कई सारे संदेसे लिख कर,

ज़मीन से जा मिली

मैंने बारिश से कई मुलाकातें की 

हर मुलाकात में उसका आतिश-ए-ग़म बढ़ता गया 

मैंने जब पूछता उससे 

तेरे रूठने की वजह क्या है 

तो वह मुझे उस फफूं की तरह खामोश हो कर ताड़ती 

और ज़मीन की आबरू देख कर रोने लगती 

बताने में बड़ा वक़्त लगाया 

और लगाती भी क्यों न 

साल में एक मुददत के लिए ही तो आती है 

दर्या की दरयादिली से उठती है 

सूरज के कंधों पर भटकती है 

और निगाहे-ए-यार में पनपती है 

उसकी मासूम बूँदों ने मेरी हथेलियों को पकड़कर 

मुझे एक जगह चलने के लिए कहा 

मैं चला उसके संग और देखकर दंग रह गया 

चेहरे पर छाई हुई उस मीठे पानी का सवाद नमकीन सा हो गया 

और मैं भी फिर बारिश की निगाहों से काफ़िला-ए-इंसान को देखने लगा 

किसी को समुंदर में थूकते देखा

तो किसी को नहर के किनारे मूत ते देखा

किसी को एक दूसरे पर सराबोल पानी फेंकते देखा

तो किसी को पानी बेचकर, बारिश की कीमत देखते बैठा

कहा बारिश ने

आज तू बेतहाशा पानी को बहाएगा

कल जब उस की किलत होगी, तो मस्जिद और मंदिरों में नज़र आएगा

तू कितना बड़ा ढोंगी है ए इंसान

खुद की गलतियों के लिए ख़ुदा को कसूरवार ठहराएगा

जी तो करता है, के तुझ पर बरसना बंद करदु

लेकिन क्या करू मुझ पर तुझ जैसे अकल्मन्द ही नहीं

मेरे इंतज़ार में,

कही बेज़ुबान, तो कही मासूम भी खड़ा है

लेकिन तुझे इससे क्या

तू ठहरा इंसान, पर तेरे अंदर का तो इंसान ही मरा है

Mujhe mein basse insaan ko dekh

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मुझे में बसे  इंसान को देख 

मेरे नाम से नहीं, मेरे काम से देख
मुझ में बसे  मुस्लमान को नहीं
मुझ में बसे  इंसान को देख
मेरी दाढ़ी से मेरे विचारों को मत तोल
अच्छा न बोल सके तो बुरा भी मत बोल
मेरी ज़िन्दगी पर सवाल न कर
अगर एक भारत माता की जय न कहे
तो पूरी कौम को बदनाम न कर
अगर मैँ मुसलमानो के बिच बस्ता हु
तो मेरे बच्चों को सज़ा न दे
उनके आगे खान देखकर उन्हें भगा न दे
बारूद में अगर तेरे अपनों की चीखें है
तो उस में मेरे अपनो का लहू है
जितनी मोहब्बत तुझको इस मिटटी से है
उतनी ही मोहब्बत मुझको है
ए दोस्त इल्तिजा है तुझ से
मुझ में बसे मुस्लमान को न देख
मुझ में बसे इंसान को देख

Ramadan poem 28- Intezaar

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image source- huffingtonpost.com

इंतज़ार 

बेज़ार न होजाऊँ इंतज़ार तेरे इंतज़ार में, यह हर वक़्त डर रहता है

ज़िन्दगी का अर्सा बीत गया, अब तो बता ए इंतज़ार तू कहा रहता है